संवाद : ज़िंदगी और इंसान

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इंसान:
तू हर रोज़ मुझे गिनती में क्यों रखती है?
कभी पैसों में, कभी वक़्त में,
कभी उम्मीद में—जो हर शाम कम पड़ जाती है।

ज़िंदगी:
मैं गिनती नहीं करती,
मैं आईना दिखाती हूँ।
ताकि तुम देख सको—
क्या बचा है, क्या सच में खो गया।

इंसान:
मेरे बच्चे मुझसे कुछ माँगते हैं
और मेरे हाथ ख़ाली होते हैं।
उस वक़्त लगता है
मैं पिता नहीं, कोई बहाना हूँ।

ज़िंदगी:
ख़ाली हाथ शर्म की बात नहीं,
ख़ाली नज़र शर्म की बात होती है।
अगर बच्चों ने तुम्हारी आँखों में
हिम्मत देखी है,
तो तुम अब भी उनके पिता हो।

इंसान:
मैं किसी से माँगता नहीं,
फिर भी हर रोज़ कुछ छिन जाता है।

ज़िंदगी:
ईमानदारी सस्ती नहीं होती,
बस उसका दाम देर से मिलता है।

इंसान:
तू मुझे मशीन बना रही है—
काम, थकान, नींद… बस यही।

ज़िंदगी:
नहीं,
तुमने खुद को रुकने की इजाज़त नहीं दी।
एक दिन हँस लो,
मैं रुक जाऊँगी।

इंसान:
कब तक यह संघर्ष?

ज़िंदगी:
जब तक तुम सिर्फ़ लड़ते रहोगे।
जिस दिन जीना चुन लोगे,
मैं हल्की हो जाऊँगी।

इंसान (धीरे से):
तो शुक्रिया किस बात का?

ज़िंदगी:
इस बात का कि
तुम अब भी महसूस कर सकते हो।
जो महसूस करता है,
वही ज़िंदा होता है।

ज़िंदगी का आख़िरी वाक्य:
मैं तुम्हें आसान रास्ता नहीं दूँगी,
मगर अकेला भी नहीं छोड़ूँगी—
बस मशीन मत बन जाना।

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Olivia Masskey

Carter

is a writer covering health, tech, lifestyle, and economic trends. She loves crafting engaging stories that inform and inspire readers.

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